- अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक शक्ति में बदलने में नाकाम रहे हैं पहाड़ी नेता
- मदन बिष्ट से लेकर दीप्ति रावत को भी नहीं किया सपोर्ट, अपनों को अपनो ने मारा
दिल्ली विश्वविद्यालय में मैंने जब छात्र राजनीति की शुरुआत की तो मेरे मन में मदन सिंह बिष्ट छाये थे कि वो उत्तराखंड के होने के बावजूद डीयू के प्रेसीडेंट बन गये। मैं ये मानता हूं कि 1985 से 2000 तक दिल्ली में उत्तराखंड के अच्छे और युवा नेताओं की पौध बनी थी। हम सबके अग्रज मदन बिष्ट थे। हमारा मनोबल ऊंचा था। 1994 में जब राज्य आंदोलन जब जोर पकड़ रहा था, उससे ठीक पहले हमारे तीन युवा साथियों ने दिल्ली में उत्तराखंड का नाम रोशन किया। अरविंदो कालेज के रवि शर्मा ने एनएसयूआई से डूसू में संयुक्त सचिव पद पर चुनाव लड़ा और थोड़े से अंतर से चुनाव हार गये। अनिल बहुगुणा भगत सिंह कालेज के प्रेसीडेंट बने और विरेंद्र ध्यानी जाकिर हुसैन कालेज के। तीनों ही बहुत दमदार नेता थे। विरेंद्र ध्यानी पर मां सरस्वती की अनुपम कृपा थी, गजब का वक्ता था ध्यानी। वह एनडी तिवारी कांग्रेस की एनएसयूआई की टिकट डूसू उपाध्यक्ष पद पर लड़ा। चुनाव हारा लेकिन शान से। उसमें नेतृत्व की गजब क्षमता थी, लेकिन हमारे दुश्मनों को वह खटक गया और उसकी दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। मंैं उसके यूं चले जाने से टूट गया और मेरा राजनीति से मोह भंग होने लगा। इससे पहले मैं 1994 में जाकिर हुसैन कालेज का प्रेसीडेंट बना। उस दौरान पूर्व सीएम के बेटे विरेंद्र रावत दयाल सिंह और देेशबंधु कालेज से राजपाल बिष्ट (कांग्रेस के टिकट पर सतपाल महाराज के खिलाफ) के प्रेसीडेंट थे। हमारी खूब जमती थी। युवाओं की एक बड़ी टीम हो गयी थी। इस बीच करोड़ीमल कालेज से पासआउट लक्ष्मण सिंह रावत ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। मैं और अनिल बहुगुणा राज्य आंदोलन में सक्रिय हो गये। राजपाल बिष्ट ने हरीश रावत का पल्ला पकड़ लिया लेकिन हरीश रावत चूंकि राज्य के पक्ष में नहीं थे तो मैं और बहुगुणा विरेंद्र और राजपाल से अलग हो गये। इस बीच मुझ पर कालेज और आंदोलन के दौरान सात पुलिस केस हो गये। वैसे भी मैं इन सब युवाओं में से आर्थिक रूप से बहुत कमजोर था। ध्यानी की हत्या के बाद मेरे परिवार का दबाव बढ़ने लगा कि स्टूडेंट पालिटिक्स छोड़ दे। कहा जाता कि ये राजनीति हम जैसों के लिए नहंी है। कब सुधरेगा? नौकरी कर। बस, यही नौकरी तो हम पहाड़ियों का काल है। दासता है, हमारे सपनों की हत्या है। मैं पढ़ने में बहुत अच्छा था लेकिन पुलिस केस मुझे सरकारी नौकरी न करने देते। न ही मैं सरकारी नौकरी करना चाहता था। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र धस्माना, मेरे पत्रकारिता के गुरु सुरेश नौटियाल जी और भारतीय विद्या भवन के तत्कालीन प्रिंसीपल जीएस नेगी जी ने मुझे पत्रकार बनने के लिए प्रेरित किया और पत्रकारिता कोर्स के दौरान राजेंद्र रतूड़ी भाई और प्रताप शाही जी ने अपने बिजनेस में पार्टटाइम रोजगार की व्यवस्था की। अनिल बहुगुणा विदेश चला गया। हमारी जोड़ी टूट गयी। आज सक्रिय रूप से राजपाल बिष्ट ही राजनीति में है। मदन बिष्ट पहाड़ आ गये और विधायक भी बन गये, लेकिन उन्होंने यहां जनता को निराश ही किया। वे दिल्ली में कुछ न बन सके। दीप्ति रावत डूसू अध्यक्ष बनी तो आस बढ़ी कि दिल्ली में एक बार फिर पहाड़ियों को बोलबाला होगा, लेकिन वो भी अब उत्तराखंड है। हालांकि दीप्ति यहां दर्जाधारी मंत्री है और उससे काफी उम्मीदें हैं। भाजपा नेता विनोद बछेती ने एक-दो साल पहले एकमुठ-एकजुट का अच्छा प्रयोग किया था लेकिन वो अपनी उस लोकप्रियता को भुना नहीं सके। हालांकि अब भी उनसे उम्मीदें बाकी हैं। हरीश जुयाल और लक्ष्मण रावत को न कांग्रेस ने न भाजपा ने घास डाली। कारण, न पहाड़ी नेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेता समृद्ध होते हैं और न पहाड़ी अपनों का साथ देते हैं। पहाड़ियों की निष्ठा केवल नौकरी तक सीमित है। उनकी सोच घर से नौकरी और नौकरी से घर तक की है। मजबूरी भी है कि हम पहाड़ी आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। हमारा माईबाप नहीं होता। एक पहाड़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ी जब कुछ बन जाता है तो सबसे पहले पहाड़ी को ही नीचा दिखाता है तो नीचे वाले पहाड़ी ऊपर वाले की टांग खींचने लगते हैं। दिक्कत यह भी है कि हमारे परिजन हमें राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं। मनोबल गिराते हैं। कांग्रेस से टिकट मांग रहे लक्ष्मण रावत के साथ यही हो रहा है। नौकरी पेशा लोग एक बार तो भीड़ के रूप में उसके साथ चले जाते हैं लेकिन दूसरी और तीसरी बार जाने के लिए आदमी नहीं मिलतेेेेेे। आर्थिक समस्या भी बड़ी बात है। तीसरी बात अपनी लोकप्रियता को हम वोट या समर्थन में नहीं बदल पाते हैं। ऐसे में जब हम पहाड़ी टिकट मांगते हैं तो देगा कौन? राजनीतिक दलों को वो नेता चाहिए होता है जो सक्षम भी हो और संपन्न भी। या फिर ऐसा नेता जो टिकट न मांगे, बल्कि उसे देना पड़े। इसलिए मेरे प्यारे पहाड़ियो दिल्ली में नौकरी करने गये हो तो नौकरी करो और राजनीतिक शक्ति बनने की कोशिश न करो। क्योंकि भेड़ों को तो एक कुत्ता ही हांक ले जाता है।