- न तीन में न तेरह में, फिर कौन परवाह करें पहाड़ की
- हम पहाड़ के लोग बन गये हैं अभिशप्त अपने ही लिए
सीन-एक
हर विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले प्रदेश की राजनीतिक रूप से मुर्दा कौम की कुछ अवैध नस्लें कुछ समय के लिए जिन्दा होने लगती है। उनकी नसों में, भुजाओं में और दिमाग में कुछ कीड़ा कुलबुलाने लगता है, कि वो कुछ हैं, या कुछ कर सकते हैं। जैसे केंचुआ सोचने लगे कि मैं तो सांप जितना लंबा हो गया। यह सुखद एहसास होते ही वो बहुत जोर लगाने की कोशिश करते हैं, जैसे कब्ज का मरीज पखाने में जोर लगाता है, लेकिन निकलता कुछ भी नहीं। राजनीति की इन अवैध नस्लों को यह खुशफहमी होती है कि वो अलग छवि बना रहे हैं। अलग मंच संवार रहे हैं, जबकि उनके साथ 200 जिंदा लोग भी नहीं होते। मैं पिछले 9 साल से देहरादून में हूं और मैंने कभी नहीं देखा कि कोई क्षेत्रीय दल हजार-दो हजार लोगों को भी एकत्रित कर पाया हो। चुनाव में भी नहीं। सब के सब क्षेत्रीय दल़ निकम्मे और निठल्ले कहीं के। कोई विचार नहीं, कोई नीति नहीं। है तो सिर्फ दलाली। क्या ऐसे कुकुरमुत्ते बन सकते हैं सिंहासन के रखवाले?
सीन -दो
अपनी छाती में कई तमगे लगाए फौजी अफसर गोल्फ खेलते, डीएसओआई में जाम छलकाते पहाड़ की गरीबी और वहां के विकास की बातें करते हैं। लेकिन पहाड़ चढ़ने को कोई तैयार नहीं? कोई नेतृत्व को तैयार नहीं? क्योंकि कोई चाहता है उपनल में एडजस्ट हो जाऊं, कोई चाहता है कि प्रोजेक्ट मिल जाएं, कोई चाहता है कि एक्स-सर्विसमैन लीग का ही कुछ बन जाऊं। मैंने दुश्मनों की छाती में गोली मारने वाले बड़े बड़े फौजी अफसरों को सत्ता के टटपुंजिए नेताओं की जी-हजूरी करते देखा है। जिनको पहाड़ की मिट्टी ने सबकुछ दिया वो पहाड़ की मिट्टी को ही ठिकाने लगाने में जुटे हैं। कभी पहाड़ की पगडंडी नाप कर रेड कारपेट पर चलने वाले इन फौजी अफसरों की पहाड़ संबंधी सोच दारू पीते या गोल्फ खेलते होती है और फिर बाथरूम जाते ही सब बियर के झाग सा निकल जाता हैं। ऐसे में कौन करेगा पहाड़ की परवाह?
सीन -3
वो जो लोग अलग राज्य के लिए आंदोलनरत थे। लाठियां खाई- गोलियां खाई, राज्य बनते ही चंद हजार की सरकारी नौकरी मिलने के बाद सब सपने भूल गये। जो अन्य बचे, भाजपा और कांग्रेस की गोदी में बैठ गये। जनता ने जिन गद्दारों को प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचाया वो भी भाजपा-कांग्रेस की गोदी में जा बैठे। आज भी नहीं उतरे और क्षेत्रीय जनता की बात करते हैं। यानी जिसे वाॅचडाॅग की भूमिका में होना चाहिए था, वो दलाल निकल गये। फिर कोई क्यों पहाड़ की परवाह करे।
सीन -4
जिन अध्यापकों और वैज्ञानिकों पर प्रदेश को सबसे अधिक नाज था, वो बेवफा निकले। अध्यापकों ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बजाए नेतागिरी की, दलाली की और प्रापर्टी डीलिंग करनी शुरू कर दी। जिन्होंने जनता को जागरूक करना था वो स्कूल छोड़ देहरादून में दलाली करने लगे। इतिहास गवाह है कि जब गुरु भ्रष्ट हो जाता है तो उस समाज की नस्लें बेकार हो जाती हैं। पहाड़ के गुरु भ्रष्ट हैं इसलिए पहाड़ नष्ट हो रहा है। जब गुरु को ही पहाड़ की परवाह नही ंतो फिर और कोई क्यों परवाह करें? कृषि वैज्ञानिक बोझ बन गये। पंत नगर विवि ने 20 वर्ष में एक भी ऐसा अनुसंधान पहाड़ के लिए नहीं किया जिस पर हमें नाज हो, तो कोई क्यों पहाड़ की परवाह करे।
सीन - पांच
जिस कौम को नौकरी ही भाती हो। जो चाकरी में विश्वास करे। जिसे दूसरे की गुलामी पसंद हो, उस कौम की परवाह दूसरे क्यों करें? ऐसे में उत्तराखंड का कुछ नहीं हो सकता। लुटते रहेगा पहाड़ और यहां की बहती रहेगी जवानी और पानी, जब तक कि खत्म न हो जाए।
सीन -छह
जिस प्रदेश के ग्रामीण महिलाएं कोल्ड ड्रिक, पकोड़े, समोसे और जलेबी, एक पत्ता माथे की बिंदी में अपना वोट बेच दें और पुरुष दारू की बोतल और 500 रुपये में। क्या उस प्रदेश का भला होगा? जिसने पैसे देकर वोट लिए हैं, वो अपना पैसा वसूल करेगा या जनता का काम करेगा? ऐसे में पहाड़ की परवाह कौन करेगा? सोचो जरा।
